प्रयागराज। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 28 जनवरी को प्रयागराज माघ मेला छोड़ दिया। 11 दिनों से माघ मेले में धरने पर बैठे शंकराचार्य बुधवार सुबह बिना संगम स्नान किए काशी के लिए रवाना हो गए। जाते-जाते उन्होंने प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि “आज मन इतना व्यथित है कि पवित्र संगम में स्नान किए बिना लौटना पड़ रहा है, जिसकी कभी कल्पना नहीं की थी।”
प्रेस कॉन्फ्रेंस में शंकराचार्य ने कहा कि वे श्रद्धा, आस्था और आत्मिक शांति की भावना लेकर प्रयागराज आए थे, लेकिन माघ मेले में हुई एक घटना ने उनकी आत्मा को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने कहा कि जब दिल में दुख और पीड़ा हो, तब संगम का पवित्र जल भी मन को शांति नहीं दे पाता।
अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि माघ मेला प्रशासन की ओर से उन्हें पालकी में बैठाकर पूरे सम्मान के साथ संगम स्नान कराने का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसमें फूलों की वर्षा और अधिकारियों की उपस्थिति का भी उल्लेख था। हालांकि, उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
शंकराचार्य ने स्पष्ट कहा कि प्रशासन ने मौनी अमावस्या के दिन हुई घटना के लिए कोई औपचारिक माफी नहीं मांगी। जब तक गलती स्वीकार कर दोषी लोग सच्चे मन से माफी नहीं मांगते, तब तक ऐसे किसी भी सम्मान को स्वीकार करना उनके लिए संभव नहीं है।
माघ मेला 15 फरवरी तक चलना है और अभी माघी पूर्णिमा तथा महाशिवरात्रि के दो प्रमुख स्नान शेष हैं। बावजूद इसके, शंकराचार्य ने विवाद के चलते माघ मेला 18 दिन पहले ही छोड़ दिया। उन्होंने मौनी अमावस्या और बसंत पंचमी पर भी स्नान नहीं किया था और अब शेष दोनों स्नानों में भी शामिल नहीं होंगे।
शंकराचार्य ने कहा कि माघ मेले में संतों, संन्यासियों और ब्रह्मचारियों के साथ जो व्यवहार हुआ, वह पूरे सनातनी समाज का अपमान है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस घटना के पीछे केवल स्थानीय प्रशासन नहीं, बल्कि राज्य शासन की जिम्मेदारी भी है।
उन्होंने कहा,
“मेरे सम्मान को ठेस पहुंचाने का प्रयास हुआ है। इन 11 दिनों में हमारी प्रतिष्ठा की हत्या का प्रयास किया गया। किसकी जीत हुई और किसकी हार, यह समय बताएगा। फैसला सनातनी समाज करेगा।”
अविमुक्तेश्वरानंद ने युवाओं से अपील करते हुए कहा कि सनातनी प्रतीकों का अपमान करने वालों को उनकी “औकात दिखानी होगी।” उन्होंने संकेत दिए कि यदि समाज चाहेगा, तो इस अन्याय के खिलाफ आगे भी आंदोलन किया जाएगा।
18 जनवरी को माघ मेले में स्नान के दौरान शंकराचार्य की पालकी रोके जाने के बाद पुलिस और शिष्यों के बीच धक्का-मुक्की हुई थी। इसके बाद वे शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए थे। प्रशासन द्वारा शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगे जाने, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की टिप्पणी और उसके जवाब में दिए गए बयानों से विवाद और गहराता चला गया। इस मुद्दे पर संत समाज भी दो हिस्सों में बंट गया।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बिना संगम स्नान किए माघ मेला छोड़ना केवल एक धार्मिक निर्णय नहीं, बल्कि प्रशासन और शासन के लिए एक बड़ा संदेश है। यह मामला अब केवल व्यक्तिगत सम्मान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सनातनी समाज, धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक व्यवहार पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आने वाले दिनों में यह विवाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर और गहराने की संभावना रखता है।
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