जयपुर की सलीम मंज़िल में छुपी 200 साल पुरानी रूहानी अमानत! मोहर्रम में खुलता है ‘कुलाह-ए-मुबारक’ का राज

गुलाबी नगरी की गलियों में छुपी रूहानी धड़कन

जयपुर: की चहल-पहल भरी गलियों में, जौहरी बाजार की रौनक से कुछ कदम भीतर बढ़ते ही समय जैसे ठहर जाता है। हल्दियों का रास्ता और ऊँचा कुआँ की पुरानी बस्तियों के बीच खड़ी है सलीम मंज़िल—एक ऐसी हवेली जो केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि दो सदियों से अधिक पुरानी जीवित विरासत है।

इस हवेली की दीवारों में रियासतकाल की यादें हैं, कमरों में यूनानी हिकमत की परंपरा है और एक विशेष हॉल में सुरक्षित है हज़रत इमाम हुसैन अ.स. से जुड़ी पवित्र निशानी “कुलाह-ए-मुबारक”


दिल्ली से जयपुर: सम्मान और जिम्मेदारी की शुरुआत

परिवार के मौजूदा वारिस 33 वर्षीय मोइनुद्दीन खान बताते हैं कि उनके पूर्वज वर्ष 1812 के आसपास दिल्ली से जयपुर आए थे। उस समय जयपुर रियासत के महाराजा जगत सिंह ने उनके बुजुर्ग हकीम वासल अली खान को जागीर और ताज़ीम प्रदान की थी। यह सम्मान उनकी चिकित्सा विद्वता का प्रतीक था।

इसके बाद अज़ीम खान और हकीम सलीम अली खान ने ताज़ीमी सरदार के रूप में प्रशासनिक और सामाजिक जिम्मेदारियाँ निभाईं। परिवार की पहचान केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं रही, बल्कि राज्य प्रशासन में भी उनकी मजबूत भूमिका रही।


जयपुर स्टेट की सुरक्षा से जुड़ा गौरव

परिवार के अज़ीम खान जयपुर स्टेट के इंटेलिजेंस विभाग के प्रमुख रहे। उस दौर में यह पद अत्यंत संवेदनशील माना जाता था। राज्य की राजनीतिक गतिविधियों और सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी उनकी जिम्मेदारी थी। उनके बाद सलीम अली खान ने भी यही दायित्व निभाया। लगातार दो पीढ़ियों तक इस भूमिका का निर्वहन परिवार की विश्वसनीयता का प्रमाण है।


स्थापत्य की अद्भुत मिसाल

सलीम मंज़िल का निर्माण वर्ष 1867 में शुरू हुआ और 1870 तक यह हवेली पूर्ण रूप से तैयार हो गई। लगभग एक बीघा क्षेत्र में फैली इस इमारत में पारंपरिक राजस्थानी नक्काशी, जालीदार खिड़कियाँ, ऊँची छतें और मेहराबदार दरवाज़े आज भी अपनी शान बिखेरते हैं।

जहाँ शहर की कई पुरानी हवेलियाँ होटल या व्यावसायिक परिसरों में बदल चुकी हैं, वहीं इस परिवार ने इसे व्यावसायिक बनाने के बजाय इसकी ऐतिहासिक आत्मा को सुरक्षित रखा है।


रूहानी अमानत: कुलाह-ए-मुबारक

सलीम मंज़िल की सबसे बड़ी पहचान “कुलाह-ए-मुबारक” है। परिवार के अनुसार 17वीं सदी की शुरुआत में उनके पूर्वजों ने ईरान के एक बादशाह का सफल इलाज किया था। बादशाह ने धन देने की इच्छा जताई, लेकिन उन्होंने हज़रत इमाम हुसैन अ.स. से जुड़ी पवित्र टोपी की मांग की।

बताया जाता है कि शाही मुहर लगी सनद के साथ यह अमानत उन्हें भेंट की गई। वर्ष 1876 से यह पवित्र निशानी सलीम मंज़िल में सुरक्षित है।

साल भर यह विशेष काँच के बॉक्स में संरक्षित रहती है। हर वर्ष मोहर्रम की 9 और 10 तारीख को इसे ज़ियारत के लिए खोला जाता है। उन दिनों हवेली में इत्र और गुलाब की खुशबू के साथ आध्यात्मिक माहौल बन जाता है। देशभर से श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं, फातेहा पढ़ी जाती है और तबर्रुक बाँटा जाता है।

मोइनुद्दीन खान कहते हैं,
“यह हमारे लिए विरासत नहीं, अमानत है। इसे संभालना हमारी जिम्मेदारी है।”


ऐतिहासिक मेहमानों की गवाह

यह हवेली कई प्रमुख नेताओं और समाजसेवियों की मौजूदगी की साक्षी रही है। परिवार के मुखिया नसीमुद्दीन खान ‘प्यारे मियां’ ने यूनानी चिकित्सा और सामाजिक सेवा को बढ़ावा देने के लिए ऑल इंडिया हकीम अजमल खान मेमोरियल सोसाइटी की स्थापना की थी। वर्ष 2020 में उनके निधन के बाद नई पीढ़ी ने यह जिम्मेदारी संभाली।


कला और आधुनिकता से जुड़ाव

सलीम मंज़िल आधुनिक दौर से कटी नहीं है। कई फिल्मों और वेब सीरीज़ की शूटिंग यहाँ हो चुकी है। मोइनुद्दीन खान ने एक वेब सीरीज़ में श्रीकृष्ण की भूमिका भी निभाई। परिवार का मानना है कि परंपरा के साथ कला और संवाद भी जरूरी है।

आज यह परिवार डिजिटल माध्यमों से इस विरासत को दुनिया तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा है। ज़ियारत के बेहतर इंतज़ाम के लिए नए हॉल के निर्माण की योजना भी बनाई जा रही है।


साझा सांस्कृतिक विरासत की जीवित कहानी

जयपुर की हवेलियाँ केवल स्थापत्य धरोहर नहीं, बल्कि इतिहास की साँस लेती किताबें हैं। सलीम मंज़िल ऐसी ही एक जीवित किताब है, जहाँ रियासत की प्रशासनिक यादें भी हैं और कर्बला की रूहानी विरासत भी।

मोहर्रम की नौवीं शाम जब कुलाह-ए-मुबारक के दीदार के लिए दरवाज़े खुलते हैं, तो वह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं होती—वह भरोसे, आस्था और जिम्मेदारी का संगम होती है, जो पीढ़ियों को जोड़ता है।


निष्कर्ष:

सलीम मंज़िल केवल एक ऐतिहासिक हवेली नहीं, बल्कि जयपुर की साझा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। यहाँ इतिहास, आस्था, प्रशासनिक गौरव और आधुनिक सोच एक साथ दिखाई देते हैं।

दो सदियों से अधिक समय से संभाली जा रही “कुलाह-ए-मुबारक” की यह अमानत बताती है कि विरासत केवल संपत्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी होती है—जिसे हर पीढ़ी को विश्वास और सम्मान के साथ आगे बढ़ाना होता है।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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