जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने लिमिटेशन एक्ट (परिसीमा अधिनियम) को लेकर एक महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कॉन्ट्रैक्ट समाप्त होने के बाद भुगतान नहीं किया जाना ‘निरंतर उल्लंघन’ नहीं माना जा सकता और ऐसे मामलों में तीन साल की वैधानिक समय-सीमा लागू होगी।
हाईकोर्ट ने उदयपुर की कॉमर्शियल कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें राजस्थान स्टेट रोड डेवलपमेंट एंड कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन (RSRDC) को ठेकेदार कंपनी को करीब 41 लाख रुपए ब्याज सहित चुकाने का आदेश दिया गया था।
यह फैसला जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने RSRDC की अपील स्वीकार करते हुए सुनाया।
मामला उदयपुर के सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण कार्य से संबंधित है। RSRDC ने मैसर्स प्रमाण कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड को 1 सितंबर 2009 को करीब 2.74 करोड़ रुपए का वर्क ऑर्डर दिया था। कार्य 16 सितंबर 2009 से शुरू होकर 11 माह में पूरा होना था।
हालांकि ड्रॉइंग, प्रगति और शर्तों को लेकर विवाद खड़े हो गए, जिसके बाद RSRDC ने 23 सितंबर 2010 को कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया और 13 लाख रुपए की पेनल्टी लगाई। इसके बाद 6 अक्टूबर 2010 को फाइनल माप (फाइनल मेजरमेंट) की प्रक्रिया पूरी की गई।
ठेकेदार कंपनी ने अंतिम बिल भुगतान, सिक्योरिटी डिपॉजिट की वापसी और पेनल्टी रद्द करने की मांग को लेकर 10 दिसंबर 2015 को सिविल सूट दायर किया, यानी कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के लगभग 5 साल बाद। यह मामला बाद में कॉमर्शियल कोर्ट, उदयपुर को ट्रांसफर कर दिया गया।
कॉमर्शियल कोर्ट ने 5 जून 2024 को ठेकेदार के पक्ष में फैसला देते हुए RSRDC को:
27.66 लाख रुपए (फाइनल बिल),
13.56 लाख रुपए (सिक्योरिटी डिपॉजिट),
और 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज
चुकाने का आदेश दिया था।
RSRDC के वकील ने हाईकोर्ट में दलील दी कि लिमिटेशन एक्ट के अनुसार पैसे की वसूली का दावा 3 साल के भीतर किया जाना चाहिए। चूंकि कॉन्ट्रैक्ट वर्ष 2010 में समाप्त हो गया था, इसलिए अधिकतम 2013 तक ही केस किया जा सकता था।
2015 में दायर किया गया मुकदमा पूरी तरह समय-सीमा से बाहर है, इसलिए कॉमर्शियल कोर्ट का फैसला कानून के खिलाफ है।
वहीं ठेकेदार पक्ष ने तर्क दिया कि भुगतान रोके रखना ‘Continuing Breach’ (निरंतर उल्लंघन) है, इसलिए लिमिटेशन लागू नहीं होती। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने 2013 में विवाद निपटारा समिति और अधिकारियों को पत्राचार किया था।
हाईकोर्ट ने ठेकेदार की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि:
6 अक्टूबर 2010 को फाइनल माप के साथ ही संविदात्मक संबंध समाप्त हो गए थे।
लिमिटेशन की तीन साल की अवधि अक्टूबर 2013 में समाप्त हो चुकी थी।
केवल पत्राचार या ज्ञापन देने से समय-सीमा नहीं बढ़ती।
भुगतान नहीं होना आर्टिकल 55 के तहत निरंतर उल्लंघन नहीं, बल्कि एक बार घटित होने वाली घटना है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें कानून से ऊपर नहीं हो सकतीं और समय-सीमा समाप्त होने के बाद आर्बिट्रेशन क्लॉज का सहारा लेना भी वैध नहीं है।
डिवीजन बेंच ने माना कि कॉमर्शियल कोर्ट ने लिमिटेशन जैसे बुनियादी मुद्दे पर गलत निष्कर्ष निकालते हुए समय पार सूट को डिक्री में बदल दिया, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने 5 जून 2024 का पूरा जजमेंट और डिक्री आदेश रद्द कर दिया।
राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी ठेकों और संविदात्मक विवादों में लिमिटेशन एक्ट की सख्त अनुपालना को स्पष्ट करता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के वर्षों बाद बकाया मांगना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है और केवल पत्राचार या भुगतान न मिलने को निरंतर उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
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