नई दिल्ली। देश के सबसे साफ शहर के तमगे पर गर्व करने वाला इंदौर आज गंभीर सवालों के घेरे में है। इंदौर दूषित जल मामला अब सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस और जवाबदेही की मांग का बड़ा मुद्दा बन चुका है। गंदे और दूषित पानी से फैली बीमारी के कारण अब तक 14 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर हैं। इस बीच कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार और केंद्र पर तीखा हमला बोला है।
राहुल गांधी ने इस पूरे मामले को “जीवन के अधिकार की हत्या” करार देते हुए कहा कि भाजपा शासित मध्य प्रदेश कुप्रशासन का केंद्र बन चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस त्रासदी पर “हमेशा की तरह खामोश” हैं।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट कर कहा,
“इंदौर में पानी नहीं, ज़हर बंटा और प्रशासन कुंभकर्णी नींद में रहा। घर-घर मातम है, गरीब बेबस हैं और ऊपर से भाजपा नेताओं के अहंकारी बयान।”
उन्होंने आरोप लगाया कि स्थानीय लोगों ने बार-बार गंदे और बदबूदार पानी की शिकायत की, लेकिन प्रशासन ने समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की। राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि जब हालात बिगड़ रहे थे, तब जल आपूर्ति बंद क्यों नहीं की गई।
इंदौर दूषित जल मामले में राहुल गांधी के सवाल सीधे शासन-प्रशासन की कार्यशैली पर निशाना साधते हैं। उन्होंने पूछा—
सीवर का पानी पीने की सप्लाई में कैसे मिला?
समय रहते जल आपूर्ति बंद क्यों नहीं की गई?
जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं पर कार्रवाई कब होगी?
राहुल गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
“ये ‘फोकट’ सवाल नहीं हैं, ये जवाबदेही की मांग है। साफ पानी कोई एहसान नहीं, यह जीवन का अधिकार है।”
उन्होंने भाजपा के “डबल इंजन” शासन को इस पूरे संकट का जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि लापरवाह प्रशासन और संवेदनहीन नेतृत्व ने गरीबों की जान ली है।
इस पूरे विवाद को और हवा तब मिली जब इंदौर दूषित जल मामले पर एनडीटीवी के सवाल के जवाब में कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कथित तौर पर कहा, “फोकट का सवाल मत पूछो।” इस बयान को लेकर तीखी आलोचना हुई। बाद में विवाद बढ़ने पर विजयवर्गीय ने माफी जरूर मांगी, लेकिन तब तक राजनीतिक नुकसान हो चुका था।
कांग्रेस ने इसे जनता की पीड़ा के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता बताया, जबकि भाजपा ने इसे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाया।
प्रशासन का कहना है कि दूषित जल आपूर्ति के स्रोत की जांच की जा रही है और प्रभावित इलाकों में वैकल्पिक पानी की व्यवस्था की गई है। वहीं, स्थानीय लोगों का आरोप है कि शिकायतों को नजरअंदाज किया गया और समय रहते कदम उठाए जाते तो मौतें रोकी जा सकती थीं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल आपूर्ति और सीवरेज सिस्टम की नियमित जांच होती, तो हालात इतने गंभीर न होते।
इंदौर दूषित जल मामला अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही का बड़ा सवाल बन चुका है। राहुल गांधी के आरोपों ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। बड़ा सवाल यही है—क्या जिम्मेदारों पर ठोस कार्रवाई होगी या यह मामला भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में दबकर रह जाएगा?
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