प्रयागराज। किराए के मकान में रहने वालों के लिए यह सवाल हमेशा डर पैदा करता रहा है कि अगर रेंट एग्रीमेंट नहीं है, तो क्या मकान मालिक कभी भी उन्हें घर से निकाल सकता है? अब इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला दिया है, जिसने किराएदारी से जुड़े हजारों मामलों की दिशा तय कर दी है। अदालत ने साफ कर दिया है कि बिना रेंट एग्रीमेंट किरायेदार बेदखली के लिए भी मकान मालिक कानूनी रूप से आवेदन कर सकता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किराएदारी से जुड़ी छह याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किराएदारी रेगुलेशन एक्ट, 2021 की विस्तृत व्याख्या की। अदालत ने कहा कि रेंट अथॉरिटी का अधिकार क्षेत्र केवल उन्हीं मामलों तक सीमित नहीं है, जहां लिखित रेंट एग्रीमेंट मौजूद हो या उसकी जानकारी रेंट अथॉरिटी को दी गई हो।
जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की सिंगल बेंच ने अपने आदेश में कहा कि 2021 के अधिनियम के तहत रेंट अथॉरिटी का अधिकार क्षेत्र केवल लिखित समझौतों तक सीमित मानना कानून की मंशा के खिलाफ होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर मकान मालिक और किरायेदार के बीच संबंध को लेकर कोई विवाद नहीं है, तो केवल इस आधार पर कि लिखित एग्रीमेंट नहीं हुआ या जानकारी दर्ज नहीं कराई गई, मकान मालिक को बेदखली के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यदि विधायिका की मंशा यह होती कि केवल लिखित एग्रीमेंट वाले मामलों में ही रेंट अथॉरिटी का दरवाजा खटखटाया जाए, तो सेक्शन 9 के सब-सेक्शन (5) को कानून में शामिल ही नहीं किया जाता। यह प्रावधान अपने आप में इस बात का संकेत है कि बिना रेंट एग्रीमेंट किरायेदार बेदखली के मामलों में भी रेंट अथॉरिटी सुनवाई कर सकती है।
हाईकोर्ट ने धारा 4 की उपधारा (3) में प्रयुक्त “Shall” शब्द की भी व्याख्या की। अदालत ने कहा कि यह शब्द केवल किराएदारी की जानकारी रेंट अथॉरिटी को देने के सीमित उद्देश्य से जुड़ा है। इसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि अगर जानकारी नहीं दी गई, तो मकान मालिक के बेदखली के अधिकार खत्म हो जाएंगे। एक बार जब मकान मालिक-किरायेदार संबंध निर्विवाद हो, तो “Shall” शब्द का सहारा लेकर कानूनी प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता।
इन मामलों में याचिकाकर्ता या तो मकान मालिक थे या किरायेदार। सभी ने अपनी इमारतें आवासीय या व्यावसायिक उद्देश्य से किराए पर दी थीं।
पांच याचिकाएं संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत दाखिल की गई थीं
छठा मामला प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 25 के तहत SCC रिवीजन के रूप में दायर किया गया था
सभी मामलों में मुख्य सवाल यही था कि क्या बिना लिखित रेंट एग्रीमेंट और बिना रेंट अथॉरिटी में जानकारी दर्ज कराए मकान मालिक का आवेदन सुनवाई योग्य है।
इस फैसले से मकान मालिकों को बड़ी राहत मिली है, खासकर उन मामलों में जहां वर्षों से मौखिक समझौते के आधार पर किराएदारी चल रही है। वहीं किरायेदारों के लिए यह फैसला चेतावनी की तरह है कि केवल लिखित एग्रीमेंट की कमी उन्हें बेदखली से नहीं बचा सकती। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे किराएदारी विवादों में तेजी आ सकती है और लोग लिखित समझौतों को लेकर ज्यादा सतर्क होंगे।
निष्कर्ष:
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला साफ संकेत देता है कि बिना रेंट एग्रीमेंट किरायेदार बेदखली अब केवल तकनीकी आधार पर नहीं रोकी जा सकती। यह निर्णय मकान मालिकों के अधिकारों को मजबूत करता है, लेकिन साथ ही किरायेदारों के लिए भी सवाल खड़ा करता है—क्या अब बिना लिखित समझौते रहना जोखिम भरा साबित होगा?
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