सीकर। केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) के नियमों में किए गए बदलावों के खिलाफ कांग्रेस ने अब आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है। सीकर के अंबेडकर पार्क में आज कांग्रेस के दिग्गज नेताओं और कार्यकर्ताओं ने 5 घंटे का सांकेतिक उपवास रखकर 'मनरेगा बचाओ संग्राम' का शंखनाद किया।
20 साल पुराने कानून के अस्तित्व पर संकट उपवास के दौरान सीकर जिलाध्यक्ष सुनीता गिठाला ने केंद्र की भाजपा सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि मनरेगा ने पिछले 20 वर्षों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संभाला है। उन्होंने कहा, "जिस मनरेगा ने गरीब के चूल्हे जलाए और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया, आज केंद्र सरकार उसका स्वरूप बदलकर गरीबों के मुंह से निवाला छीन रही है।"
आंदोलन की रूपरेखा: 45 दिन, हर वार्ड और पंचायत यह आंदोलन केवल उपवास तक सीमित नहीं रहेगा। कांग्रेस ने इसे एक बड़े जन-आंदोलन में बदलने की योजना बनाई है:
जन जागरण अभियान: कल से लेकर 29 जनवरी तक कांग्रेस कार्यकर्ता जिले की प्रत्येक ग्राम पंचायत और वार्ड में जाएंगे।
चौपाल चर्चा: नुक्कड़ सभाओं के जरिए ग्रामीणों को नए कानून की कमियां बताई जाएंगी।
तुलना: कांग्रेस ने इस संघर्ष की तुलना 'किसान आंदोलन' से करते हुए कहा कि जैसे कृषि कानून वापस हुए, वैसे ही मनरेगा के नए नियम भी वापस कराए जाएंगे।
नए नियमों पर कांग्रेस की आपत्ति पार्टी के जिला प्रभारी विशाल जांगिड़ और अन्य नेताओं ने नए प्रावधानों पर मुख्य रूप से तीन आपत्तियां दर्ज की हैं:
रोजगार की गारंटी खत्म: कांग्रेस का आरोप है कि नए नियमों से रोजगार की संवैधानिक गारंटी लगभग समाप्त हो गई है।
राज्यों पर आर्थिक बोझ: नए कानून के तहत राज्य सरकारों को 40% मजदूरी का भार उठाना होगा। यदि राज्य सक्षम नहीं है, तो वहां विकास कार्य ठप हो जाएंगे।
केंद्रीकृत नियंत्रण: अब काम का चयन ग्राम पंचायतें नहीं बल्कि केंद्र सरकार करेगी, जिससे स्थानीय स्वायत्तता खत्म होगी।
दिग्गजों की मौजूदगी इस उपवास कार्यक्रम में सीकर विधायक राजेंद्र पारीक, निवर्तमान सभापति जीवण खां, राजेश सैनी, ओबीसी मोर्चा जिलाध्यक्ष नरेश सैनी और कांग्रेस प्रवक्ता गोविंद पटेल सहित भारी संख्या में पदाधिकारी मौजूद रहे। नेताओं ने एक सुर में कहा कि जब तक सरकार कदम पीछे नहीं खींचती, संघर्ष जारी रहेगा।
कांग्रेस का यह 'मनरेगा बचाओ संग्राम' आगामी चुनावों से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पैठ मजबूत करने की एक बड़ी रणनीति मानी जा रही है। भाजपा के 'केंद्रीकरण' बनाम कांग्रेस के 'स्थानीय स्वशासन' के इस विवाद में अब गेंद जनता के पाले में है। क्या कांग्रेस किसानों की तरह मजदूरों को भी एकजुट कर पाएगी? यह आने वाले 45 दिन तय करेंगे।
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