मुंबई: महानगरपालिका (BMC) के चुनावी नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया है। मौजूदा रुझानों के अनुसार, भाजपा बीएमसी में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरती दिख रही है। अगर यही रुझान अंतिम नतीजों में तब्दील होते हैं, तो यह 25 साल में पहली बार होगा जब ठाकरे परिवार का मुंबई महानगरपालिका पर शासन पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
बीएमसी चुनाव लगभग चार साल की देरी के बाद कराए गए। 15 जनवरी (गुरुवार) को मतदान हुआ और अब सामने आए रुझानों ने न सिर्फ मुंबई बल्कि पूरे महाराष्ट्र और देश की राजनीति का ध्यान इस चुनाव पर केंद्रित कर दिया है।
बृहन्मुंबई महानगरपालिका देश की सबसे अमीर नगर निकाय है। यह मुंबई शहर के प्रशासन, बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा, जल आपूर्ति, सड़क, सफाई और आपदा प्रबंधन जैसी अहम जिम्मेदारियां निभाती है। बीएमसी का बजट कई राज्यों के बजट से भी अधिक है और इसका फंड मुख्य रूप से प्रॉपर्टी टैक्स, जल कर, विकास शुल्क और राज्य एवं केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान से आता है।
बीएमसी में शिवसेना का इतिहास 1971 से शुरू होता है, जब पार्टी के हेमचंद्र गुप्ते महापौर बने। हालांकि ठाकरे परिवार का वास्तविक वर्चस्व 1985 के बाद शुरू हुआ। उस वर्ष 170 सीटों पर चुनाव हुए और शिवसेना ने मजबूती से अपनी पकड़ बनाई।
1992 तक शिवसेना ने बीएमसी पर शासन किया। इसके बाद 1992 से 1996 के बीच आरपीआई और कांग्रेस ने सत्ता संभाली। लेकिन 1996 के चुनाव में शिवसेना ने जबरदस्त वापसी की और इसके बाद 2022 तक लगातार 25 वर्षों तक बीएमसी पर ठाकरे परिवार का नियंत्रण बना रहा।
ताजा रुझानों के मुताबिक, भाजपा बीएमसी में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर रही है। शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और अन्य विपक्षी दल बहुमत के आंकड़े से पीछे नजर आ रहे हैं। यह स्थिति ठाकरे परिवार के लिए अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती मानी जा रही है।
महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक चंद्रकांत शिंदे के अनुसार, भाजपा गठबंधन की बढ़त के पीछे मुख्य रूप से चार बड़े कारण रहे हैं।
पहला, विकास का मुद्दा। भाजपा ने अपने प्रचार में कोस्टल रोड, मेट्रो, फ्लाईओवर और बुनियादी ढांचे से जुड़े कार्यों को प्रमुखता से रखा। पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि मुंबई के विकास में उनकी भूमिका निर्णायक रही है।
दूसरा, महायुति गठबंधन की ताकत। देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के एक साथ आने से भाजपा-शिवसेना (शिंदे गुट) की ताकत कई गुना बढ़ गई। शिवसेना के दो हिस्सों में बंटने से ठाकरे गुट कमजोर हुआ और उसका पारंपरिक वोट बैंक बिखर गया।
तीसरा, संगठनात्मक मजबूती और सत्ता का लाभ। भाजपा की पकड़ वार्ड और बूथ स्तर तक मजबूत रही। सत्ता में होने के कारण पार्टी को सरकारी योजनाओं, संसाधनों और प्रशासनिक पहुंच का फायदा मिला, जिसका असर सीधे मतदाताओं पर पड़ा।
चौथा, शहरी मतदाता का बदला रुझान। मुंबई का शहरी वोटर अब स्थानीय भावनाओं से ज्यादा विकास, सुविधाओं और स्थिर प्रशासन को प्राथमिकता देता दिख रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बीएमसी में संभावित हार ठाकरे परिवार के लिए सिर्फ एक चुनावी हार नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक पकड़ के कमजोर होने का संकेत है। शिवसेना की पहचान, जो कभी मुंबई की आत्मा मानी जाती थी, अब बिखरती हुई दिखाई दे रही है।
बीएमसी चुनाव के मौजूदा रुझान यह साफ संकेत दे रहे हैं कि मुंबई की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। 1996 से चला आ रहा ठाकरे परिवार का वर्चस्व अब इतिहास बनने की कगार पर है। भाजपा की यह बढ़त सिर्फ एक नगर निगम की जीत नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में सत्ता संतुलन के बदलने का संकेत है, जिसका असर आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी साफ दिखाई दे सकता है।
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