राजस्थान: के सीकर में मंगलवार को जिला कलेक्ट्रेट परिसर उस समय नारों से गूंज उठा जब सैकड़ों आशा सहयोगिनियां अपनी 7 सूत्री मांगों को लेकर प्रदर्शन करने पहुंचीं। “मिनिमम सैलरी 18 हजार करो”, “रिटायरमेंट पर 5 लाख दो”, “सरकारी कर्मचारी का दर्जा दो” जैसे नारों के साथ महिला कर्मचारियों ने प्रदेश सरकार के खिलाफ हल्ला बोल किया।
राजस्थान आशा सहयोगिनी कर्मचारी संघ के बैनर तले जिलेभर से आशा सहयोगिनी महिलाएं पहले डाक बंगले पर एकत्रित हुईं। वहां से रैली के रूप में कलेक्ट्रेट पहुंचीं।
कलेक्ट्रेट गेट पर पहुंचते ही उन्होंने जोरदार नारेबाजी की और अपनी मांगों को लेकर आवाज बुलंद की। प्रदर्शन के बाद एडीएम रतन कुमार स्वामी को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा गया।
प्रदर्शनकारी महिलाओं ने स्पष्ट कहा कि जब तक उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। उनकी प्रमुख मांगों में शामिल हैं—
संविदा नियम 2022 में समावेशन करते हुए सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए।
प्रत्येक आशा सहयोगिनी को न्यूनतम 18,000 रुपए प्रतिमाह वेतन और वार्षिक वेतन वृद्धि दी जाए।
परमानेंट लाभ, अनुकंपा नियुक्ति, पीएफ, पेंशन, स्वास्थ्य सुरक्षा समेत सभी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ दिया जाए।
रिटायरमेंट पर 5 लाख रुपए की एकमुश्त सम्मान राशि दी जाए।
भर्ती और पदोन्नति में वरीयता दी जाए; योग्य आशा वर्कर्स को एएनएम और सुपरवाइजर पदों में प्राथमिकता मिले।
ऑनलाइन कार्यों में राहत दी जाए और स्मार्टफोन उपलब्ध कराए जाएं।
मॉनिटरिंग एक स्तर पर हो, अलग-अलग अधिकारियों को रिपोर्ट देने का मानसिक दबाव समाप्त किया जाए।
प्रदर्शन में शामिल प्रदेशाध्यक्ष अलका किनियां और आशा सहयोगिनी चंदा कुमारी ने कहा कि आशा कार्यकर्ता स्वास्थ्य विभाग की रीढ़ हैं। टीकाकरण, प्रसव पूर्व जांच, पोषण अभियान, परिवार नियोजन, सर्वे कार्य और आपदा के समय घर-घर जाकर सेवाएं देने का काम आशा सहयोगिनियां करती हैं।
इसके बावजूद उन्हें मानदेय के नाम पर बहुत कम राशि दी जाती है, जो समय पर भी नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि महंगाई के इस दौर में 18 हजार रुपए न्यूनतम वेतन भी पर्याप्त नहीं है, लेकिन फिलहाल यही उनकी प्राथमिक मांग है।
महिलाओं ने कहा कि वे वर्षों से काम कर रही हैं, लेकिन उन्हें पेंशन, पीएफ, बीमा या अन्य सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता। यदि किसी आशा सहयोगिनी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है, तो परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।
इसीलिए उन्होंने रिटायरमेंट पर 5 लाख रुपए की सम्मान राशि और अनुकंपा नियुक्ति की मांग को प्रमुखता से रखा है।
प्रदर्शन के दौरान महिलाओं ने चेतावनी दी कि यदि सरकार जल्द फैसला नहीं करती, तो वे कार्य बहिष्कार करेंगी। साथ ही आगामी पंचायत और निकाय चुनाव में सरकार के खिलाफ रणनीति बनाई जाएगी।
यह बयान राजनीतिक रूप से भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में आशा सहयोगिनियों का मजबूत जनसंपर्क नेटवर्क होता है।
आशा सहयोगिनियों ने यह भी कहा कि उन्हें लगातार ऑनलाइन रिपोर्टिंग, पोर्टल अपडेट और मोबाइल ऐप के जरिए डेटा अपलोड का काम करना पड़ता है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या रहती है, जिससे मानसिक दबाव बढ़ता है।
उन्होंने मांग की कि ऑनलाइन काम के लिए स्मार्टफोन और इंटरनेट सुविधा उपलब्ध कराई जाए तथा रिपोर्टिंग की प्रक्रिया सरल बनाई जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि आशा कार्यकर्ता ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की अहम कड़ी हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की कई योजनाएं इनके माध्यम से ही गांव-गांव तक पहुंचती हैं।
यदि इनका कार्य बहिष्कार होता है, तो टीकाकरण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाएं और पोषण अभियान प्रभावित हो सकते हैं।
एडीएम को ज्ञापन सौंपने के बाद प्रशासन की ओर से आश्वासन दिया गया कि मांगों को सरकार तक पहुंचाया जाएगा। हालांकि अभी तक किसी ठोस निर्णय की घोषणा नहीं हुई है।
प्रदर्शनकारी महिलाओं ने कहा कि वे प्रतीक्षा करेंगी, लेकिन यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
संघ के नेताओं ने बताया कि यह प्रदर्शन केवल सीकर तक सीमित नहीं है। प्रदेशभर के जिला मुख्यालयों पर इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
यदि सरकार ने सकारात्मक कदम नहीं उठाया तो राज्य स्तर पर बड़ा आंदोलन किया जाएगा।
सीकर कलेक्ट्रेट पर आशा सहयोगिनियों का प्रदर्शन केवल वेतन वृद्धि की मांग नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा की मांग भी है। न्यूनतम 18 हजार रुपए वेतन, 5 लाख रिटायरमेंट सम्मान राशि और सरकारी कर्मचारी का दर्जा—ये सभी मांगें लंबे समय से लंबित हैं।
अब देखना यह होगा कि सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है। यदि समाधान नहीं निकला, तो यह आंदोलन स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यापक असर डाल सकता है।
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