गंभीर आरोपों और दो अलग-अलग परिवाद/एफआईआर दर्ज होने के बावजूद अब तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी या ठोस कानूनी कार्रवाई सामने नहीं आने से पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, आरोपी अरुण कुसुंबीवाल पर आरोप है कि उन्होंने स्वयं को सोसायटी का सचिव बताते हुए जाली मोहर और कूटरचित दस्तावेज तैयार किए। आरोप यह भी है कि इन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सोसायटी की भूमि से जुड़े एक भूखंड का किरायानामा तैयार कर उसे किराए पर दिया गया और लगभग चार लाख रुपये अवैध रूप से वसूल लिए गए।
बताया जा रहा है कि किरायानामा पूरी तरह फर्जी था और उसमें प्रयुक्त सील-मोहर भी जाली थी। जब इस पूरे प्रकरण की जानकारी सोसायटी के वास्तविक पदाधिकारियों को मिली, तब मामले का खुलासा हुआ।
जांच के दौरान सामने आया कि कथित आरोपी द्वारा सोसायटी के नाम से फर्जी सील और हस्ताक्षर तैयार किए गए थे। दस्तावेजों में सोसायटी की आधिकारिक भाषा और प्रारूप की नकल की गई, जिससे प्रथम दृष्टया वह वैध प्रतीत हो सके।
सोसायटी सदस्यों का कहना है कि यह केवल साधारण ठगी नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश है, जिसमें अमानत में खयानत और आपराधिक षड्यंत्र के तत्व भी शामिल हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो यह भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं—धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक विश्वासघात और कूटरचना—के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आएगा।
पीड़ित पक्ष ने दिनांक 22/08/2025 को प्रथम परिवाद संख्या 278780592501250 दर्ज कराया। इसके बाद 22/11/2025 को द्वितीय एफआईआर संख्या 0892/2025 दर्ज की गई।
दो अलग-अलग शिकायतों के बावजूद अब तक न तो आरोपी की गिरफ्तारी हुई है और न ही पुलिस की ओर से कोई सार्वजनिक प्रगति रिपोर्ट सामने आई है।
यही कारण है कि अब यह मामला केवल ठगी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पुलिस की निष्क्रियता को लेकर भी चर्चा का विषय बन गया है।
स्थानीय लोगों और सोसायटी के पदाधिकारियों का आरोप है कि आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं और जांच में किसी प्रकार की तेजी नहीं दिखाई जा रही।
प्रश्न यह उठ रहा है कि जब दो एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं, तो गिरफ्तारी या पूछताछ की कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है, या फिर किसी प्रभाव के कारण मामला आगे नहीं बढ़ पा रहा?
हालांकि पुलिस की ओर से आधिकारिक रूप से यह कहा गया है कि जांच जारी है, लेकिन पीड़ित पक्ष का कहना है कि उन्हें अब तक किसी ठोस प्रगति की जानकारी नहीं दी गई।
रिसर्च डवलपमेंट सोसायटी के सदस्यों ने इस पूरे मामले को सोसायटी की साख पर हमला बताया है। उनका कहना है कि फर्जी किरायानामा बनाकर न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया, बल्कि सोसायटी की भूमि और संपत्ति की सुरक्षा पर भी खतरा पैदा किया गया।
उन्होंने निष्पक्ष जांच, आरोपी की शीघ्र गिरफ्तारी और संपत्ति की विधिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।
यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो वे उच्च अधिकारियों और न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि फर्जी किरायानामा तैयार कर धन वसूलना गंभीर आर्थिक अपराध है। यदि किसी व्यक्ति ने स्वयं को पदाधिकारी बताकर जाली दस्तावेज तैयार किए हैं, तो यह न केवल धोखाधड़ी बल्कि कूटरचना और आपराधिक षड्यंत्र की श्रेणी में आता है।
ऐसे मामलों में पुलिस को दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच, बैंक लेन-देन की पड़ताल और संबंधित व्यक्तियों के बयान दर्ज करने चाहिए।
यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो आरोपी को कठोर दंड का सामना करना पड़ सकता है।
यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़ा करता है। जब दो एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं, तो क्या कारण है कि अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई?
क्या जांच प्रक्रिया में देरी हो रही है या फिर मामले को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि कहीं प्रभावशाली लोगों की दखल के कारण जांच की रफ्तार धीमी तो नहीं पड़ गई है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
पुलिस की कथित निष्क्रियता के कारण क्षेत्र में अविश्वास का माहौल बन रहा है। लोगों का कहना है कि यदि आर्थिक अपराध के मामलों में भी त्वरित कार्रवाई नहीं होगी, तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करें?
सोसायटी सदस्यों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो वे विरोध प्रदर्शन और उच्च स्तरीय जांच की मांग करेंगे।
यदि पुलिस सक्रिय होती है तो दस्तावेजों की जांच, आरोपी से पूछताछ और बैंक खातों की पड़ताल जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
साथ ही, सोसायटी की संपत्ति पर किसी भी प्रकार के अवैध लेन-देन को रोकने के लिए प्रशासनिक स्तर पर नोटिस या स्टे आदेश भी जारी किया जा सकता है।
मामला आर्थिक अपराध शाखा को भी सौंपा जा सकता है, यदि जांच में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े के संकेत मिलते हैं।
जयपुर के Shivdaspura थाना क्षेत्र में रिसर्च डवलपमेंट सोसायटी से जुड़ा यह मामला केवल चार लाख रुपये की ठगी का नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा भी है।
दो एफआईआर दर्ज होने के बावजूद ठोस कार्रवाई का अभाव कई सवाल खड़े करता है। अब देखना होगा कि पुलिस इस मामले में कितनी तेजी और निष्पक्षता से कार्रवाई करती है।
यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो यह मामला आर्थिक अपराधों के खिलाफ सख्त संदेश दे सकता है, लेकिन यदि जांच लंबित ही रही तो जनता का विश्वास डगमगा सकता है।
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