जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक सजायाफ्ता कैदी के पैरोल आवेदन को बिना ठोस कारण खारिज किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए एसीएस होम, डीजीपी, भरतपुर कलेक्टर और एसपी को तलब कर स्पष्टीकरण मांगा है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की लापरवाही पैरोल के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देती है और यह कैदियों के वैधानिक तथा मौलिक अधिकारों का हनन है।
यह आदेश जस्टिस महेंद्र गोयल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने भरतपुर सेंट्रल जेल में बंद कैदी अनिल कपूर उर्फ रिंकू की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि प्रतिदिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें पैरोल प्रार्थना पत्र को बिना पर्याप्त कारण के अस्वीकार कर दिया जाता है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता गोविंद प्रसाद रावत ने अदालत को बताया कि अनिल कपूर 12 साल से अधिक की सजा काट चुका है और पिछले चार वर्षों से ओपन जेल में रह रहा है। उसका जेल रिकॉर्ड और आचरण संतोषजनक रहा है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग, भरतपुर के संयुक्त निदेशक ने भी अपनी रिपोर्ट में पैरोल देने की सिफारिश की थी।
इसके बावजूद भरतपुर एसपी की रिपोर्ट के आधार पर उसका पैरोल आवेदन खारिज कर दिया गया। इस पर अदालत ने एसपी की रिपोर्ट में की गई टिप्पणियों को “अनुचित और अनावश्यक” बताया।
अदालत ने कहा कि एसपी की रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया है कि कैदी अपने माता-पिता से मिलने के लिए पैरोल चाहता है, जबकि उसके पिता स्वस्थ हैं और उनकी देखभाल के लिए तीन अन्य पुत्र मौजूद हैं। कोर्ट ने इसे पैरोल खारिज करने का पर्याप्त आधार नहीं माना।
रिपोर्ट में कैदी के फरार होने की आशंका भी जताई गई थी, लेकिन इसके समर्थन में कोई ठोस तथ्य या प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल आशंका के आधार पर किसी व्यक्ति के अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसके समर्थन में ठोस सामग्री उपलब्ध न हो।
खंडपीठ ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि पूर्व में कई बार एसीएस होम और डीजीपी को इस व्यवस्था में सुधार के लिए कहा गया था। बावजूद इसके कोई प्रभावी सुधार नहीं हुआ। अदालत ने इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही बताया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई पर एसीएस होम और डीजीपी स्वयं उपस्थित होकर यह स्पष्ट करें कि पैरोल मामलों में इस तरह की उदासीनता क्यों बरती जा रही है। साथ ही भविष्य में ऐसी लापरवाही से बचने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे, इसका रोडमैप भी प्रस्तुत किया जाए।
पैरोल व्यवस्था का उद्देश्य केवल राहत देना नहीं, बल्कि कैदियों के पुनर्वास और सामाजिक पुनर्संयोजन को बढ़ावा देना है। अच्छा आचरण, निर्धारित अवधि की सजा पूरी करना और सामाजिक परिस्थितियां—इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए पैरोल पर विचार किया जाता है।
अदालत ने संकेत दिया कि यदि अधिकारी बिना गंभीर कारणों के आवेदन खारिज करते रहेंगे, तो यह पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पैरोल आवेदन पर पुनर्विचार कर उचित आदेश पारित करने के निर्देश भी दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 6 मार्च को निर्धारित की गई है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि संबंधित अधिकारी कोर्ट के समक्ष क्या स्पष्टीकरण पेश करते हैं और भविष्य में क्या सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं।
यह मामला न केवल एक कैदी के अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि राज्य में पैरोल प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
राजस्थान हाईकोर्ट का यह सख्त रुख प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक पारदर्शिता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि कैदियों के अधिकारों के साथ लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अब अगली सुनवाई में अधिकारियों का पक्ष और कोर्ट की आगे की टिप्पणी इस मामले की दिशा तय करेगी।
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