आतंकवाद को जड़ से खत्म करने का एक ही रास्ता! प्रायोजकों पर प्रहार क्यों जरूरी – विशेषज्ञ की चेतावनी

लेखक: कर्नल (डा ) देव आनंद लोहामरोड़,

(आतंकवाद पर पीएचडी - सुरक्षा एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ)

12 मार्च 2026: पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई में एक नए और निर्णायक अध्याय की शुरुआत का संकेत दिया है। मार्च की शुरुआत से मध्य-पूर्व में तेजी से बदलते घटनाक्रमों ने दुनिया को एक कठोर सच्चाई से रूबरू करा दिया है—आतंकवाद को केवल हथियार उठाने वाले आतंकियों को मारकर समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके पीछे खड़े प्रायोजकों, वित्तपोषकों और वैचारिक संचालकों को भी जवाबदेह बनाना होगा।


जब एक विशेष शासन ने कई देशों को निशाना बनाते हुए मिसाइलों की बौछार की और दुबई के रिहायशी इलाकों में निर्दोष नागरिकों को लक्ष्य बनाया, वह भी पवित्र रमज़ान के महीने की पवित्रता की परवाह किए बिना—तो यह स्पष्ट हो गया कि कट्टरपंथ न तो सीमाओं का सम्मान करता है और न ही धर्म का। पिछले डेढ़ वर्ष में मध्य-पूर्व की घटनाओं ने इस सच्चाई को और स्पष्ट कर दिया है। अक्टूबर 2023 में इज़राइल पर हुए भीषण आतंकी हमले के बाद जब इज़राइल ने जवाबी सैन्य कार्रवाई शुरू की, तो धीरे-धीरे यह सामने आने लगा कि हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती जैसे संगठन केवल अलग-थलग आतंकी समूह नहीं हैं, बल्कि एक सुव्यवस्थित परोक्ष (प्रॉक्सी) नेटवर्क का हिस्सा हैं।

दशकों से इन संगठनों को वित्तीय सहायता, हथियार, प्रशिक्षण और वैचारिक समर्थन देने वाला एक राज्य संरक्षित ढांचा मौजूद रहा है। आज जब इज़राइल इन संगठनों के खिलाफ व्यापक कार्रवाई कर रहा है, तो दुनिया के सामने यह भी उजागर हो रहा है कि उन्हें पालने-पोसने और संसाधन उपलब्ध कराने वाला तंत्र ही क्षेत्रीय अस्थिरता का वास्तविक स्रोत रहा है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब केवल आतंकियों को निशाना बनाने की रणनीति से आगे बढ़कर उन संरचनाओं, नेतृत्व तंत्र और प्रायोजक शक्तियों को भी जवाबदेह ठहराने की दिशा में सोचने लगा है, जिन्होंने दशकों तक इस परोक्ष युद्ध को जिंदा रखा।


मध्य-पूर्व की राजनीति केवल युद्ध और सैन्य टकराव का क्षेत्र नहीं है; यह परिभाषाओं, वैधता और विमर्श (नैरेटिव) की भी लड़ाई है। आज दुनिया के सामने यह कठिन प्रश्न खड़ा है कि आतंकवादी वास्तव में कौन है। क्या वह संगठन जो राज्य के विरुद्ध हथियार उठाता है और नागरिकों को निशाना बनाता है, या वह राज्य जो अपनी सैन्य शक्ति के माध्यम से व्यापक विनाश करता है? यही बहस तब और गहरी हो जाती है जब चर्चा ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की नीतियों के इर्द-गिर्द घूमती है। एक पक्ष ईरान को आतंकवाद का संरक्षक बताता है, जबकि दूसरा पक्ष इज़राइल की सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना करते हुए उन्हें राज्य-प्रायोजित हिंसा का रूप बताता है और यह तक कहता है कि उस राज्य के अस्तित्व का अधिकार ही नहीं होना चाहिए।


1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान की सुरक्षा नीति में बड़ा परिवर्तन आया। पारंपरिक सैन्य शक्ति की सीमाओं को देखते हुए तेहरान ने एक रणनीति विकसित की जिसे अक्सर “प्रतिरोध की धुरी” (Axis of Resistance) कहा जाता है। इस ढांचे के अंतर्गत ईरान ने क्षेत्र में कई गैर-राज्य संगठनों के साथ अपने संबंध मजबूत किए—जिनमें गाज़ा में हमास, लेबनान में हिज़्बुल्लाह, यमन में हूती और इराक में कई शिया मिलिशिया समूह शामिल हैं।

इन संगठनों को वित्तीय सहायता, हथियार, प्रशिक्षण और वैचारिक समर्थन के विभिन्न स्तर उपलब्ध कराए गए, जिससे वे क्षेत्रीय प्रभाव के साधन के रूप में कार्य कर सकें। ईरान के दृष्टिकोण से यह नेटवर्क एक प्रतिरोधक क्षमता और प्रभाव विस्तार का माध्यम है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि इन संगठनों का उपयोग समय-समय पर पड़ोसी देशों के साथ भू-राजनीतिक संघर्षों को प्रॉक्सी युद्ध के रूप में आगे बढ़ाने के लिए किया गया है। इस संदर्भ में 7 अक्टूबर 2023 को इज़राइल पर हमास द्वारा किया गया हमला अक्सर एक उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जाता है, जिसे इज़राइल और उसके सहयोगी व्यापक प्रॉक्सी संघर्ष का हिस्सा मानते हैं।


दूसरी ओर इज़राइल की सुरक्षा नीति उसके इतिहास और भौगोलिक वास्तविकताओं से गहराई से जुड़ी हुई है। 1948 में स्थापना के बाद से इज़राइल ने कई युद्धों और सुरक्षा संकटों का सामना किया है। इसी कारण उसने एक रणनीतिक सिद्धांत विकसित किया जिसमें संभावित खतरे को पूरी तरह उभरने से पहले ही समाप्त कर देने की नीति शामिल है—जिसे अक्सर “निवारक प्रहार” (Pre-emptive Strike) कहा जाता है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में यह नीति और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि गाज़ा और अन्य क्षेत्रों में बड़े सैन्य अभियानों के दौरान नागरिकों की भारी हानि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।


इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू अंतरराष्ट्रीय कानून भी है। आज तक संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आतंकवाद की एक सर्वमान्य परिभाषा तय नहीं कर सकी हैं। सामान्यतः आतंकवाद शब्द का उपयोग उन गैर-राज्य संगठनों के लिए किया जाता है जो राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नागरिकों को निशाना बनाते हैं, जबकि राज्यों द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई को अलग कानूनी श्रेणियों में रखा जाता है।
  भारत के लिए इन घटनाओं से महत्वपूर्ण सबक निकलते हैं। मध्य-पूर्व को अस्थिर करने वाला यह वैश्विक आतंकी नेटवर्क हमारे अपने पड़ोस से भी जुड़ा हुआ है। वर्षों से यह प्रमाण सामने आता रहा है कि अंतरराष्ट्रीय जिहादी संगठनों और पाकिस्तान के सुरक्षा प्रतिष्ठान के कुछ तत्वों के बीच गहरे संबंध रहे हैं। पहलगाम हमले से पहले पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हमास से जुड़े प्रतिनिधियों की बैठकों ने इस अंतरराष्ट्रीय आतंकी जुड़ाव को और स्पष्ट किया। यह घटनाक्रम एक असहज लेकिन स्पष्ट सच्चाई को उजागर करता है—मेरे विचार में कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद को केवल सीमाओं की रक्षा करके या घुसपैठियों को मारकर समाप्त नहीं किया जा सकता। दशकों से दुनिया का ध्यान उन आतंकियों पर केंद्रित रहा है जो बंदूक उठाते हैं या विस्फोट करते हैं। लेकिन ये लोग केवल एक बड़े पिरामिड की सबसे निचली परत हैं। इनके पीछे वित्तपोषक, खुफिया संचालक, वैचारिक प्रचारक और राज्य प्रायोजक होते हैं, जो दूर बैठे—अक्सर वातानुकूलित कमरों से—हिंसा का संचालन करते हैं।


  भारत को इन रणनीतिक सबकों को गंभीरता से समझना होगा। पिछले एक दशक में भारत की आतंकवाद विरोधी नीति—जो आतंकवाद के प्रति पूर्ण शून्य सहनशीलता पर आधारित है—एक क्रमिक और अधिक निर्णायक रणनीतिक दृष्टिकोण के रूप में विकसित हुई है। 2016 में उरी हमले के बाद भारत ने पहली बार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया। 2019 में पुलवामा हमले के बाद भारत ने बालाकोट में हवाई कार्रवाई करते हुए आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को नष्ट किया और यह स्पष्ट संदेश दिया कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई सीमाओं के पार भी की जा सकती है। इसके बाद ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में भारत ने दुश्मन के हवाई ठिकानों, आतंकी ढांचे और सैन्य संसाधनों को निशाना बनाकर यह दिखाया कि उसकी प्रतिक्रिया अब केवल प्रतीकात्मक नहीं रही है।


इस क्रमिक विकास को आगे बढ़ाते हुए भारत को अब एक स्पष्ट आतंकवाद-रोधी सिद्धांत की औपचारिक घोषणा करनी चाहिए—कि उसकी संप्रभुता के विरुद्ध किसी भी आतंकी कार्रवाई का जवाब केवल आतंकवादियों को मारने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उस पूरे तंत्र को नष्ट करने तक जाएगा जो उन्हें जन्म देता है। इसमें वित्तीय नेटवर्क, रसद तंत्र और वे निर्णय-केंद्र—राजनीतिक तथा सैन्य दोनों—शामिल होंगे जो आतंकवाद को प्रायोजित, निर्देशित और संचालित करते हैं। ऐसी नीति की घोषणा से भारत एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश देगा कि आतंकवाद अब केवल कुछ बंदूकधारी उग्रवादियों की समस्या नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे राज्य-समर्थित तंत्र के रूप में देखा जाएगा जिसके योजनाकारों, कमांडरों और राजनीतिक संरक्षकों को भी जवाबदेह ठहराया जाएगा। केवल इन कमांड संरचनाओं को निशाना बनाकर ही आतंकवाद की जड़ को वास्तव में समाप्त किया जा सकता है।


जब तक आतंकवाद के संरक्षक सुरक्षित रहेंगे, तब तक आतंक का यह ज़हरीला वृक्ष बार-बार उगता रहेगा। इसलिए भारत के लिए आगे का मार्ग स्पष्ट है—आतंकवाद को उसकी शाखाएं काटकर नहीं हराया जा सकता; इसे उसकी जड़ों से उखाड़ना होगा।


आतंकवाद से मुक्ति का अब केवल एक ही रास्ता है—उसके मूल कारण का पूर्ण उन्मूलन।
 

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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