जयपुर। जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) की कार्रवाई अब सवालों के घेरे में नजर आ रही है। ग्राम सुमेल बेनाडा की ढाणी स्थित जेडीए स्वामित्व की भूमि खसरा नम्बर 208/1 पर पहले अवैध कॉलोनी काटी गई, फिर जेडीए ने बुलडोजर चलाकर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उसी जमीन पर आज फिर भारी संख्या में अवैध मकानों का निर्माण धड़ल्ले से जारी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जेडीए खुद रिकॉर्ड में इस भूमि को अपनी सरकारी जमीन मान चुका है, तो आखिरकार अतिक्रमणकारियों के हौसले इतने बुलंद कैसे हैं? क्या जेडीए की कार्रवाई केवल फोटो खिंचवाने और कागजी खानापूर्ति तक सीमित है?
05 नवंबर 2025 और 20 दिसंबर 2025 को ध्वस्तीकरण अभियान चलाने के बाद भी मौके पर दोबारा बाउंड्रीवाल, सड़क और मकानों का निर्माण होना सीधे-सीधे प्रशासनिक विफलता को उजागर करता है। यदि सरकारी भूमि पर दोबारा कब्जा हो रहा है तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों नहीं हो रही?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कॉलोनाइजर खुलेआम प्लॉट बेच रहे हैं, निर्माण सामग्री पहुंच रही है, मजदूर काम कर रहे हैं, लेकिन जेडीए का अमला आंखें मूंदे बैठा है। आखिरकार किसके संरक्षण में सरकारी जमीन पर यह अवैध साम्राज्य खड़ा किया जा रहा है?
बड़ा सवाल यह भी है कि जब आम आदमी अपने घर का नक्शा पास कराने के लिए महीनों दफ्तरों के चक्कर काटता है, तब सरकारी भूमि पर बिना अनुमति पूरी कॉलोनी कैसे बस जाती है? क्या नियम केवल आम नागरिकों के लिए हैं?
जेडीए की लगातार कार्रवाई के दावों के बावजूद यदि अवैध निर्माण नहीं रुक रहा, तो यह सिर्फ प्रशासनिक कमजोरी नहीं बल्कि पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब जनता जानना चाहती है कि सरकारी जमीन आखिर किसके भरोसे छोड़ दी गई है?
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