राजस्थान दिवस विशेष: जब जैसलमेर ने जिन्ना का प्रस्ताव ठुकराकर भारत का साथ चुना

राजस्थान दिवस के अवसर पर उस ऐतिहासिक फैसले को याद किया जा रहा है जिसने ‘वृहद राजस्थान’ के निर्माण की मजबूत नींव रखी थी। यह कहानी सीमावर्ती जैसलमेर रियासत की है, जहां के महारावलों ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के बड़े प्रलोभन को ठुकराकर भारत के साथ खड़े रहने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था।

इतिहासकार मीठालाल व्यास और मनीष रामदेव के अनुसार, देश की आजादी के बाद वर्ष 1948 में पाकिस्तान के तत्कालीन नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने जैसलमेर को पाकिस्तान में शामिल करने के लिए कई प्रयास किए थे। जिन्ना ने अपने मंत्री हासम सिलावटा को विशेष विमान से जैसलमेर भेजा था।

बताया जाता है कि हासम सिलावटा ने महारावल जवाहर सिंह को एक ऐसा प्रस्ताव दिया जिसने इतिहास की दिशा बदल सकती थी। उन्होंने महारावल को एक कोरा कागज दिया जिस पर जिन्ना के हस्ताक्षर पहले से मौजूद थे। संदेश स्पष्ट था कि महारावल अपनी मनचाही शर्तें लिख दें और जैसलमेर का पाकिस्तान में विलय कर दें।

लेकिन महारावल जवाहर सिंह ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया और अपने दीवान से मुलाकात करने को कहा। दीवान ने भी इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए बिना अनुमति जैसलमेर सीमा में विमान लाने पर हासम सिलावटा को कड़ी फटकार लगाई। परिणामस्वरूप उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा।

जिन्ना ने इसके बाद भी प्रयास जारी रखा और दिल्ली में महारावल जवाहर सिंह के पुत्र महारावल गिरधर सिंह के सामने फिर यही प्रस्ताव रखा। लेकिन इस बार भी जैसलमेर की ओर से जवाब साफ था कि राज्य भारत के साथ मजबूती से खड़ा रहेगा।

महारावल गिरधर सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि यदि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है, तो जैसलमेर पूरी मजबूती से भारत का साथ देगा। उनके इसी निर्णय ने जोधपुर और बीकानेर जैसी रियासतों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश दिया।

मार्च 1949 में जैसलमेर सहित कई रियासतों के एकीकरण के बाद ‘वृहद राजस्थान’ का गठन हुआ। यह निर्णय राजस्थान के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है।

आज वही जैसलमेर, जो कभी अकाल और कठिन परिस्थितियों से जूझता था, विकास और प्रगति का प्रतीक बन चुका है। यहां की 50 डिग्री तक पहुंचने वाली गर्मी अब सौर ऊर्जा उत्पादन में योगदान दे रही है, रेतीली हवाएं पवन ऊर्जा उत्पन्न कर रही हैं और सोनार किले से लेकर सम के धोरों तक पर्यटन की नई पहचान बनी हुई है।

जैसलमेर आज भारत की पश्चिमी सीमा का एक महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्र भी है, जहां भारतीय सेना और बीएसएफ के जवान देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। यह भूमि केवल रेत का विस्तार नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामरिक विरासत का गौरव भी है।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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