अजमेर दरगाह में ‘शिव मंदिर’ विवाद ने पकड़ा तूल: 12 याचिकाओं पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

राजस्थान: के अजमेर में स्थित विश्व प्रसिद्ध ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। दरगाह परिसर में कथित ‘शिव मंदिर’ होने के दावे को लेकर दायर याचिका पर शनिवार को जिला अदालत में लंबी सुनवाई हुई। इस दौरान करीब 12 अलग-अलग याचिकाओं पर बहस हुई और विभिन्न पक्षों ने खुद को मामले में पक्षकार बनाए जाने की मांग रखी। सुनवाई के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

यह मामला अब सिर्फ एक धार्मिक दावा नहीं, बल्कि कानूनी और सामाजिक बहस का बड़ा विषय बन चुका है। हिंदू सेना और महाराणा प्रताप सेना के पदाधिकारियों द्वारा दायर याचिका में दावा किया गया है कि अजमेर दरगाह परिसर में पहले शिव मंदिर था, जिसे बाद में बदल दिया गया।

शनिवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत में माहौल काफी गंभीर रहा। याचिकाकर्ताओं की ओर से कई दस्तावेज, ऐतिहासिक संदर्भ और कानूनी तर्क प्रस्तुत किए गए। वहीं दरगाह से जुड़े पक्षों ने भी इन दावों का विरोध करते हुए अपने आवेदन दाखिल किए।

हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने सुनवाई के बाद मीडिया से बातचीत में कहा कि अदालत ने सभी नई अर्जियों को विस्तार से सुना है। उन्होंने कहा, “अब अदालत तय करेगी कि इस मामले में किसे पक्षकार बनाया जाएगा और किन याचिकाओं को खारिज किया जाएगा।”

विष्णु गुप्ता के अधिवक्ता संदीप कुमार ने बताया कि कुछ याचिकाओं का विरोध इसलिए किया गया क्योंकि उनमें पर्याप्त तथ्य और कानूनी आधार नहीं थे। उन्होंने कहा कि अदालत ने सभी पक्षों को पूरा अवसर दिया और अब अगली तारीख पर महत्वपूर्ण आदेश आने की संभावना है।

मामले में महाराणा प्रताप सेना की ओर से भी याचिका पेश की गई। संगठन के प्रतिनिधि राजवर्धन सिंह परिहार ने स्वयं को मुख्य याचिकाकर्ता बताते हुए अदालत में अपना पक्ष रखा। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के वकील का कहना है कि कुछ पक्ष अदालत के सामने अपने तथ्यों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं कर सके।

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि एक याचिकाकर्ता फिलहाल फरार है और उसके खिलाफ अदालत द्वारा गैर-जमानती वारंट जारी किया गया है। इस मुद्दे पर भी अदालत में बहस हुई।

दूसरी ओर, दरगाह के दीवान और खादिम समुदाय की ओर से भी अदालत में आवेदन पेश किया गया। उनका कहना है कि चूंकि मामला सीधे दरगाह से जुड़ा है, इसलिए उन्हें भी पक्षकार बनाया जाना जरूरी है।

दरगाह पक्ष के अधिवक्ता सिद्धार्थ ने अदालत में पैरवी करते हुए कहा कि दरगाह दीवान साहब की ओर से प्रस्तुत आवेदन में स्पष्ट किया गया है कि इस तरह के दावे धार्मिक सौहार्द को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि सभी तथ्यों और ऐतिहासिक दस्तावेजों की गंभीरता से जांच की जाए।

वरिष्ठ अधिवक्ता एपी सिंह ने भी अदालत में अपनी दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि मामले में कई लोगों ने आवेदन लगाए हैं और अदालत को यह तय करना होगा कि कौन-सा पक्ष वास्तव में सुनवाई का अधिकार रखता है।

इस पूरे विवाद ने राजस्थान ही नहीं, देशभर में चर्चा छेड़ दी है। अजमेर दरगाह भारत की सबसे प्रमुख सूफी दरगाहों में गिनी जाती है, जहां हर धर्म और समुदाय के लोग श्रद्धा से पहुंचते हैं। ऐसे में शिव मंदिर होने के दावे ने धार्मिक और राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल अदालत का मुख्य फोकस इस बात पर है कि किन पक्षों को मामले में आधिकारिक रूप से शामिल किया जाए। इसके बाद ही मूल विवाद पर विस्तृत सुनवाई आगे बढ़ेगी।

सुनवाई के दौरान अदालत परिसर के बाहर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। बड़ी संख्या में समर्थक और विभिन्न संगठनों के लोग मौजूद रहे। प्रशासन ने स्थिति को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया था ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।

अब सभी की नजरें अदालत के अगले आदेश पर टिकी हैं। यदि अदालत कुछ पक्षों को शामिल करने की अनुमति देती है, तो आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक चर्चित हो सकता है।

फिलहाल अदालत ने सभी याचिकाओं पर सुनवाई पूरी करने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया है और अगली तारीख पर फैसला सुनाए जाने की संभावना जताई जा रही है।


निष्कर्ष:

अजमेर दरगाह में कथित शिव मंदिर होने के दावे ने कानूनी और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है। अदालत में कई पक्षों ने अपनी दावेदारी पेश की है और अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस केस में किसका पक्ष सुना जाएगा। कोर्ट का अगला फैसला इस संवेदनशील मामले की दिशा तय कर सकता है।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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