उपलब्ध जानकारी के अनुसार, न्यायाधीश विशाल भार्गव ने अपने आदेश में कहा कि पत्नी ने दूसरे पुरुष के साथ गोवा में फेरे लेने और उसके साथ वैवाहिक संबंधों जैसा व्यवहार करने की बात स्वीकार की थी। अदालत ने इन परिस्थितियों को सामान्य दोस्ती से आगे का आचरण माना।
अदालत के समक्ष पति की ओर से आरोप लगाया गया कि पत्नी ने लंबे समय तक दांपत्य सहचर्य से दूर रखा और वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन नहीं किया। मामले में नाबालिग बेटे की देखभाल तथा पति के माता-पिता के साथ व्यवहार से जुड़े पहलुओं पर भी विचार किया गया।
अदालत ने मामले की समग्र परिस्थितियों को देखते हुए माना कि घटनाओं की श्रृंखला ने पति के लिए वैवाहिक जीवन में विश्वास और संबंध बनाए रखना कठिन कर दिया था। इसी आधार पर मानसिक क्रूरता के पहलू को स्वीकार करते हुए तलाक की याचिका मंजूर कर ली गई।
मामले में दंपती का विवाह मई 2013 में हुआ था। करीब 13 साल पुराने इस वैवाहिक संबंध को अदालत के आदेश के बाद समाप्त कर दिया गया।
यह फैसला वैवाहिक विवादों में किसी एक घटना के बजाय पूरे मामले की परिस्थितियों, पति-पत्नी के आचरण और उपलब्ध साक्ष्यों के महत्व को रेखांकित करता है।
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