मीणा हाईकोर्ट के इतिहास की सबसे चर्चित कड़ी 1993 की एक हत्या की घटना से जुड़ी है। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, एक महिला द्वारा अपने पति की हत्या किए जाने और उसके प्रेमी के कथित रूप से इसमें शामिल होने का मामला सामने आया था।
इसके बाद 84 गांवों के पंच-पटेलों की बैठक हुई और आरोपियों के खिलाफ पारंपरिक सामाजिक कार्रवाई की गई। बताया जाता है कि इस कार्रवाई में प्रेमी और प्रेमिका का मुंह काला किया गया तथा प्रेमी को गधे पर बैठाकर और महिला को गधे की रस्सी पकड़ाकर गांव में घुमाया गया।
मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए पांच पंच-पटेलों को गिरफ्तार कर लिया। जब अदालत से उनकी जमानत खारिज हुई तो समाज में नाराजगी बढ़ गई। उनकी रिहाई की मांग को लेकर बड़ी संख्या में लोग लामबंद हुए और मामला सामाजिक आंदोलन का रूप लेने लगा। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 50 हजार लोगों के जुटने की बात सामने आई थी।
बढ़ते तनाव के बीच तत्कालीन महुवा विधायक किरोड़ी लाल मीणा को भी मामले में हस्तक्षेप के लिए बुलाया गया। उन्होंने समाज और प्रशासन के बीच समाधान की कोशिश की। इसके बाद गिरफ्तार पंच-पटेलों की रिहाई हुई। इसी घटनाक्रम के बाद प्यारीवास के इस स्थान को प्रतीकात्मक रूप से ‘मीणा हाईकोर्ट’ नाम दिए जाने की बात सामने आती है।
समय के साथ ‘मीणा हाईकोर्ट’ नाम मीणा समाज में व्यापक रूप से प्रचलित हो गया। यहां पंच-पटेलों की बैठकें होती हैं और समाज से जुड़े विभिन्न सामाजिक एवं सामुदायिक मुद्दों पर चर्चा की जाती है।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मीणा हाईकोर्ट कोई संवैधानिक, सरकारी या न्यायिक अदालत नहीं है। यहां न्यायाधीश नहीं बैठते और अदालत की तरह कानूनी फैसले नहीं सुनाए जाते। ‘हाईकोर्ट’ नाम इसकी सामाजिक और प्रतीकात्मक पहचान का हिस्सा है।
समय के साथ इस सामाजिक केंद्र की भूमिका भी बदल रही है। पारंपरिक सामाजिक बैठकों के साथ अब शिक्षा, युवाओं, रोजगार और सामाजिक विकास से जुड़े मुद्दे भी चर्चा का हिस्सा बन रहे हैं।
विश्व आदिवासी दिवस के कार्यक्रम में 33 साल पुरानी घटना का जिक्र करते हुए किरोड़ी लाल मीणा ने भी इस घटनाक्रम को याद किया। इस तरह दौसा का मीणा हाईकोर्ट आज भी मीणा समाज की सामाजिक एकजुटता, परंपरा और सामुदायिक पहचान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।
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