चुनाव प्रभारियों और स्थानीय विधायकों को निर्देश दिए गए हैं कि ऐसे निकायों में पार्टी के संभावित विजयी प्रत्याशियों पर नजर रखी जाए और मतदान खत्म होते ही उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जाए। माना जा रहा है कि कुछ स्थानों पर प्रत्याशियों के ठहरने के लिए होटल और रिसॉर्ट की व्यवस्था भी की गई है।
पहले चरण का मतदान खत्म होने के साथ ही अब राजनीतिक दलों की नजर मतगणना और उसके बाद होने वाले अध्यक्ष व सभापति के चुनाव पर है। 21 सितंबर तक चलने वाली बोर्ड गठन की इस सियासी कवायद में भाजपा और कांग्रेस अपने-अपने संभावित विजयी पार्षदों को एकजुट रखने के साथ-साथ निर्दलीय प्रत्याशियों को साधने की कोशिश करेंगी।
भाजपा की ओर से इस पूरी प्रक्रिया को ‘प्रशिक्षण वर्ग’ बताया जा रहा है। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में इसे बोर्ड गठन से पहले की ‘बाड़ेबंदी’ के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी की कोशिश है कि परिणाम आने के बाद उसके संभावित विजयी पार्षद किसी दूसरे राजनीतिक खेमे के संपर्क में न आएं।
करीबी मुकाबले वाले निकायों में भाजपा ने स्थानीय स्तर पर अपनी रणनीति को सक्रिय कर दिया है। संबंधित चुनाव प्रभारियों और विधायकों को प्रत्याशियों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, जरूरत पड़ने पर प्रत्याशियों को एक साथ सुरक्षित स्थान पर रखा जाएगा। यहां संगठनात्मक गतिविधियों और बोर्ड गठन की प्रक्रिया को लेकर प्रशिक्षण देने की बात कही जा रही है।
भाजपा की चिंता उन निकायों को लेकर ज्यादा है, जहां बहुमत का आंकड़ा हासिल करने के लिए एक-दो सीटों का अंतर निर्णायक साबित हो सकता है। ऐसे में परिणाम के बाद अध्यक्ष और सभापति के चुनाव तक अपने संभावित विजयी पार्षदों को एकजुट रखना पार्टी की प्राथमिकता बन गया है।
भाजपा की रणनीति सिर्फ अपने प्रत्याशियों तक सीमित नहीं है। पार्टी ने ऐसे निकायों की भी पहचान की है, जहां निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
खास तौर पर उन निर्दलीय प्रत्याशियों पर नजर रखी जा रही है, जो मजबूत स्थिति में हैं या जिनके पार्टी की विचारधारा के करीब होने की संभावना मानी जा रही है। इनमें ऐसे नेता भी शामिल हैं, जिन्हें भाजपा से टिकट नहीं मिला और उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा।
पार्टी ने इसके लिए एक विशेष टीम भी तैयार की है, जो संभावित निर्दलीय विजेताओं से संपर्क साधने और उनके राजनीतिक रुझान की जानकारी जुटाने का काम कर रही है। परिणाम आने के बाद अगर भाजपा बहुमत से पीछे रहती है तो निर्दलीयों के समर्थन से बोर्ड बनाने की कोशिश की जाएगी।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक श्याम सुंदर शर्मा के मुताबिक, स्थानीय निकायों में बोर्ड गठन का गणित विधानसभा चुनाव से काफी अलग होता है। यहां कई बार एक-दो सीटों का अंतर ही पूरे बोर्ड का भविष्य तय कर देता है।
उन्होंने कहा कि जिन निकायों में भाजपा या कांग्रेस बहुमत के आसपास रहती है, वहां एक-एक पार्षद बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे में निर्दलीय पार्षद भी अध्यक्ष या सभापति के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
शर्मा के मुताबिक, परिणाम आने के बाद राजनीतिक दलों की ओर से संपर्क और समर्थन जुटाने की कोशिशें तेज हो जाती हैं। ऐसे में पार्टियां अपने संभावित विजयी पार्षदों को एक साथ रखने की कोशिश करती हैं, ताकि दूसरे खेमे की ओर से सेंधमारी या क्रॉस वोटिंग की संभावना को कम किया जा सके।
निकाय चुनाव के नतीजों से पहले ही भाजपा के सत्ता और संगठन दोनों स्तरों पर बोर्ड गठन को लेकर निगरानी बढ़ गई है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की ओर से CMO के जरिए राजनीतिक समीकरणों पर नजर रखे जाने की बात सामने आई है।
वहीं भाजपा मुख्यालय में प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़, निकाय चुनाव प्रभारी हरीश द्विवेदी और प्रदेश संगठन महामंत्री अजेय कुमार की ओर से चुनावी समीकरणों की मॉनिटरिंग की जा रही है।
स्थानीय चुनाव प्रभारियों और विधायकों से निकायवार फीडबैक लिया जा रहा है। इसमें संभावित विजयी प्रत्याशियों की स्थिति, निर्दलीय उम्मीदवारों के रुझान और बोर्ड गठन के लिए जरूरी संख्या का आकलन किया जा रहा है।
अब भाजपा की नजर मतगणना के बाद बनने वाले समीकरणों पर है। परिणाम आने के बाद अध्यक्ष और सभापति के चुनाव तक पार्टी अपने पार्षदों को एकजुट रखने और बहुमत का आंकड़ा जुटाने के लिए पूरी ताकत लगाएगी।
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